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बता यह है कौन ?

 #बता_यह_है_कौन_? उनसे मुलाकात नहीं  कोई बात नहीं  फिर भी उनसे मुलाकात हुआ  सुनो... उनके साथ एक महाशय  प्रश्न लिए बैठा था  बता यह है कौन...? कमरा चिखने लगा  सोफे काटने लगे  पंखे के गले में खराश होने लगा  वाणी के वीर जब यह बोले  चांद भी बादल में छिपने लगा वह कहती क्या  हम अनजाने तो नहीं  मेरे लिखे एक-एक शब्द को  पढ़ती और समझाती  बस मित्र हैं... यही कहती बैठा था मैं भी वहीं  मैने भी साथ दिया  उनकी आँखों को और अपने अंदर को  झाँक लिया  यही कहा...  मैं तो सिर्फ लिखता हूँ  कवि हूँ या प्रेमी पता नहीं  लेकिन मित्र जरूर हूँ जिन पन्नों को वह पलट रही थी  वह भी अब ख़त्म हुआ समझाने का वह वक्त विशिष्ट  पता है... मैने दोनों को शुभकामनाएँ दी रात हो चली थी मैने वहाँ से जाने का नाम लिया घबराई थी  उनके बीच में सन्नाटा था  महाशय कीआँखों में  शंका का शूल  कमरे में वे सिर्फ दोनों  क्षण-क्षण जैसे सर्प  वह कहने लगी  जाओ नहीं... कुछ देर में तुम आना  मैं अकेली...

तुम पंख वाली परी हो

 #तुम_पंख_वाली_परी_हो साहूकार की चक्रवृद्धि ब्याज की तरह  बढ़ती जा रही तुमसे दूरी  तुम्हीं बताओ... भला मैं इसे कम कैसे कर पाऊँगा ?  मैने तो पहले ही कहा था  फर्क तुम्हें नहीं दिखता  लेकिन मुझे तो दिखता है  तुम तरुवर हो  और मैं तिनका आप से तुम होना आसान है  किन्तु हम होने के लिए  मुझे भट्ठी में पकते ईंट की तरह  जलना होगा क्या यह भेद मिट पाएगा ? जो हमें हम बना दे ऐसा वक्त शायद ही आये  मुझे रहने दो  धरती पर ही  तुम पंख वाली परी हो  मेरे लिए धरती है... आसमान नहीं बना | #असकरन_दास_जोगी

मैं उस वक्त के इंतज़ार में हूँ

 #मैं_उस_वक्त_के_इंतजार_में_हूँ मुझे जो आकर्षित करती है  वह तुम्हारी सादगी है  सच कहूँ... तुम प्रकृति से अलग नहीं  सेमल के फूल की तरह  तुम लाल भी होती हो  तो सरसों के फूल की तरह पीली भी  तुम्हें निहारते रहना चाहता हूँ  और तुमसे गले लगकर  सारी इच्छाओं का गुल्लक  तोड़ देना चाहता हूँ  मैं चाहता हूँ  गुल्लक से निकले  ख़ुशी,दु:ख और सारे सपनों को  तुम अपने हाथों से सहेजो  सुनो... मैं उस वक्त के इंतजार में हूँ  जहाँ हम मिलें  बिल्कुल बारिश और धरती की तरह  तब हमारी सौंधी-सौंधी महक से  एक किसान की तरह प्रकृति भी आनंदित हो उठे | #असकरन_दास_जोगी

आरम्भ से अंत तक

 #आरम्भ_से_अंत_तक वह एक छोटी सी कविता है  जिसे मैं गुनगुनाता रहता हूँ  एक बाथरूम सिंगर की तरह  जब वह सुनेगी मुझे गुनगुनाते हुए  तब वह बहरी हो सकती है  क्योंकि मैं कौआ से ज्यादा कर्कश हूँ  इस लिए उसे मुझे सुनना नहीं पढ़ना होगा  उस पर मैं  एक महाकाव्य लिखना चाहता हूँ  ठीक उसी तरह  जैसे कालिदास और मलिक मुहम्मद जायसी ने लिखा था सुनो... जयशंकर प्रसाद की तरह  उसकी प्रकृति को  नमन् करना चाहता हूँ  और महादेवी वर्मा की तरह  उसे अपनी वर्षा सुन्दरी लिखना चाहता हूँ मैं कुछ भूलना या छोड़ना नहीं चाहता  आरम्भ से अंत तक  प्रत्येक खण्ड व अध्याय में  प्रेम का ही पल्लवन हो | #असकरन_दास_जोगी

मेरी छोटी सी कविता

 #मेरी_छोटी_सी_कविता रोज यही मैं काम करूँ  गीत लिखूँ और गान करूँ  मेरी छोटी सी कविता जब भी लिखूँ ध्यान धरूँ खुद को मैं कुछ मौन करूँ मेरी छोटी सी कविता अन्तर्मन से निकलती है  शब्दों में वह ढलती है  मेरी छोटी सी कविता लोगों को वह समझाती है  मुझको भी आईना दिखाती है  मेरी छोटी सी कविता अपने चरण और पद में  सशक्त अपने मद में  मेरी छोटी सी कविता अल्हड़,भोली कितनी प्यारी है  सबको भाती सबसे न्यारी है  मेरी छोटी सी कविता जब भी लिखूँ अधूरी सी लगती  गागर में सागर भरी हुई लगती  मेरी छोटी सी कविता | #असकरन_दास_जोगी

ज़िन्दगी समन्दर है

 #ज़िन्दगी_समन्दर_है उसके ख़ाके में  मैं बैठ नहीं पाया जब तक रहे हम साथ  क्या वह परखती रही दिन रात ?  उसके लिए सब कुछ छोड़ा  अपनी तरक्की अपना ख़याल  पता है...? उसे मैं सब कुछ मान बैठा था अपना  साथ रही छोड़ने के लिए  जिसे मैं आगे बढ़ा रहा था  पता ही नहीं चला  उसका भविष्य... कब मेरे साथ असुरक्षित हो गया ? हर सुबह होती थी उसे देखकर  उसकी आँख में कटती थी रात  अब दिल कहता है  देखने को भी न मिले वह  दुनिया के किसी भी मोड़ पर अभी तालाब सूखा है  नदियाँ नहीं  छोड़कर जाने वाले से कह दो  रह लेंगे जी लेंगे  उसे मालूम हो  ज़िन्दगी समन्दर है | #असकरन_दास_जोगी

ताहुकदार

 *#ताहुकदार* जोंगे अउ तियारे ल आथे  फेर अंगरी कटा जही तभो मुतय नहीं गोड़ म  फलल-फलल भाषण देही  बइठे-बइठे खुर्सी टोरही  फेर एक ठन आड़ी के काड़ी ल नइ करय  एला जोंगबे त वोला जोंगही  करतेच हँव कहिके टरक दिही  अउ करही त... परोसीतार मारही  कलेक्टर,मुनिम,मोकड़दम का नइ समझय अपन आप ल  सुनव... अइसनेच मनखे ल  हमर गाँव गँवई डहर कहिथैं  बड़ा आये अपन आप ल  ताहुकदार समझइया | #असकरन_दास_जोगी