पंथी विश्व का सबसे तेज नृत्य( एक विराट दर्शन )

पंथी :विश्व का सबसे तेज नृत्य ( एक विराट दर्शन )

भूमिका - 

पंथी छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज द्वारा किया जाने वाला पारम्परिक लोक प्रिय नृत्य है ! सतनाम धर्म का प्रतिक चिन्ह " जैतखाम " की स्थापना या गुरू घासीदास जी की जयंती पर्व पर परम्परागत रूप से पंथी गायन के साथ नृत्य भी किया जाता है ! पंथी नृत्य की शुरूवात गुरू वंदना से होती है जिसे " सुमरनी या आहवान " भी कहा जाता है ! पंथी गीत के प्रमुख विषय गुरू घासीदास बाबा जी के चरित्र व सतनाम दर्शन पर आधारित होती है ! पंथी नृत्य पथ निर्धारित कर पंक्तिबध्द होकर व्यवस्थित रूप में किया जाता है इस कारण इसे पंथी नृत्य कहते हैं व सतनाम धर्म सतनाम पंथ जो कि एक पथ के रूप मे भी जाना जाता है  !  जिसके समाजिक व सांस्कृतिक नृत्य होने की वजह से इस नृत्य को पंथी नृत्य की संज्ञा दी गई है ! पंथी नृत्य को विश्वपटल में सतलोकी देवदास बंजारे जी एवं साथियों द्वारा सुंदर संस्कृति के रूप में उकेरा गया है जिसकी आभा आज भी लोगों को रोमांचित और आकर्षित करती है ! आदरणीय सतलोकी देवदास बंजारे जी ने पंथी को विश्व के 64 देशों में प्रस्तुत कर भारत के मूल-संस्कृति से विश्व को अवगत कराया, बंजारे जी के नृत्य व गीत आज भी प्रासंगिक हैं ! विश्व को भारत के मूल-संस्कृति से अवगत कराने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ राज्य एवं सतनाम धर्म के पहचान के रुप में  पंथी नृत्य को स्थापित किए ! आज पंथी इतना विकास कर चूका है जिसकी छटा विश्व के कोने-कोने तक जा बिखर रही है, 11-13  मार्च 2016 को दिल्ली के यमुना तट पर श्री श्री रविशंकर जी द्वारा आयोजित आर्ट ऑफ लिविंग वल्ड फेस्टिव(विश्व सांस्कृतिक महोत्सव) कार्यक्रम का आयोजन था जिसमें छत्तीसगढ़ के 1200 पंथी वादक,गायक एवं नर्तकों ने हिस्सा लिया और 58 मांदर, 116 झाँझ व झुमका के साथ 50मीटर लम्बे मंच को 4मिनट 58सेकण्ड में ओजपूर्ण  सबसे तेज पंथी नृत्य की छटा बिखेर कर 155 देशों के कलाकारों के साथ ही अपनी प्रस्तुति से सारे विश्व को मंत्रमुग्ध कर दिए !
पंथी नृत्य के मुख्य वाद्य मांदर,झाँझ है , पंथी नृत्य एक ऐसा नृत्य है जिसमें शांत रस के गीतों के साथ विर रस के नृत्य भी किया जा सकता है ! पंथी नृत्य भांगड़ा से भी अत्यंत तेज गति का नृत्य माना गया और इसे विश्व का सबसे तेज नृत्य कहा जाता है ! नृत्य का आरम्भ विलम्बित होता है किन्तु धीरे-धीरे द्रुत गति इसके चरम पर होती है और नर्तकों की देहगति और नृत्य मुद्राएं तेजी से बदलती है ! गति और लय का समन्वय नर्तकों के गतिशील हाव-भाव में देखा जा सकता है मुख्य नर्तक पहले गीत की कड़ी उठाता है और अन्य नर्तक दोहराते हुए तेजी से नाचते हैं ! पंथी नृत्य में आध्यात्मिक संदेश के साथ मानव जीवन की महत्ता भी होती है ! समाजिक जागृति व उत्थान के लिए लोगों में चेतना के पुष्प भी खिलाती है ! इस नृत्य को पंथी सम्राट देवदास बंजारे जी व श्री मिलापदास बंजारे जी एवं उनके सहयोगी साथियों ने देश-विदेश में काफी प्रतिष्ठित किया है ! सतनामी समाज में वर्तमान में पंथी के पुरोधा के रूप में आदरणीय श्री पुरानिक लाल चेलक जी को जाना जाता है कहा जाता है सतलोकी देवदास बंजारे जी ने पंथी की प्राथमिक सीख आपसे ही प्राप्त किए थे !पंथी केवल नृत्य ही नही अपितु यह योग साधना है जिसको करने से नर्तक और दर्शक योग सदृश्य आनंद की प्राप्ति करते हैं !

पंथी का शाब्दिक अर्थ :-

पंथी शब्द का अर्थ राहगीर होता है, सतनाम धर्म में सतनामी पंथी नृत्य करते हैं ! सतनाम मार्ग में चलते हुए ये सतमार्गी ( सतराही ) सतनाम के सिध्दान्तों का प्रचार करते हैं ! पथ शब्द से ही पंथी का निर्माण हुआ है ! सतगुरू कबीर दास जी के दोहे - 
बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेंड़ खजूर !
पंथी को छायां नही, फल लागे अती दूर !!
इस दोहे में पंथी शब्द राहगीर के लिए प्रयोग हुआ है उसी प्रकार सतमार्ग के प्रचार करने वाले नृत्य व गायन विधा को पंथी की संग्या दी गई है !

पंथी नृत्य की उत्पत्ति -

पंथी नृत्य व गायन की उत्पत्ति मुख्यत: एक क्रांत्तिकारी विचारधारा को लेकर हुआ ! जिसके द्वारा मानव समाज में फैली कुप्रथाओं का विरोध सांस्कृतिक कला प्रदर्शन के रूप में किया जाता है ! भूमिका में हमने देखा की पंथी मुख्य रूप से गुरू घासीदास जी के चरित्र पर आधारित होती है परंतु गुरू जी के चरित्र व दर्शन भी तो एक समाजिक क्रांत्ति, अध्यात्मिक जागृति, वैग्यानिक विचारधारा के पोषक के पक्ष पर स्थापित है ! अत: पंथी अन्याय के विरूध्द न्याय के समर्थन में खड़े होने की एक मंचीय सांहसीक कला है !
पंथी की उत्पत्ति के सम्बंध में कुछ विचारधाराएँ समाज में प्रचलित है ! यह विचारधारा समाज में पिढ़ी दर पिढ़ी स्थानांतरित होती आ रही है !

१. कुछ विद्वान कहते हैं कि जब गुरू घासीदास जी छत्तीसगढ़  की पावन धरा के धरतीपुत्रों में जागृति व चेतना भरने के लिए  ' रावटी " लगाते अर्थात लोगों में धार्मिक, अध्यात्मिक ,समाजिक,वैग्यानिक, राजनितिक, शैक्षणिक जागृति लाने के उध्देश्य से गांव-गांव जाते सत उपदेश देते तब वे उन किन्ही गांव में जाने से पहले उस गांव के बाहर किसी स्थान पर तम्बू लगाकर पड़ाव डालते तथा गुरू जी के आगमन की खबर सुनकर गांव वाले उनके उपदेशों को सुनने के लिए अपने गांव में भव्य स्वागत के साथ ले जाते और गुरू जी वहां सत उपदेश " गुरू वाणी " के रूप में सुनाते इस प्रकार की विधि को ही " रावटी " लगाना कहा जाता है ! तथा इन्ही रावटीयों में गुरू जी के स्वागत के रूप में पंथी नृत्य का जन्म हुआ ! प्रारंभ में पंथी नृत्य समान्य धीमें नृत्य के रूप में था पंथी की प्रारंभिकता का सुत्र यह भी हैं की जब गुरू घासीदास जी ने सर्व प्रथम जैतखाम की स्थापना किए तब लोग हर्षित होकर ,गोलाकार पंक्तिबध्द रूप में जैतखाम के चारो ओर सतनाम के जयघोष करते हुए झुमने लगे वही स्थित बाद में पंथी नृत्य का रूप धारण किया  !

.पंथी के उत्पत्ति के सम्बंध में दूसरा मंतक्य यह है कि जब गुरू घासीदास जी के द्वितीय पुत्र राजा गुरू बालकदास जी समाज को स्वालम्बन तथा आत्म रक्षा व समस्त प्राणियों की रक्षा करने की कला में लोगों को दक्ष करने के लिए मानव समाज में " अखाड़ा प्रथा " की नीव डाले जिसमें लोगों को अस्त्र,शस्त्र, कुस्ति व्यायाम विद्या सिखाई जाती थी जिससे वे समाज व देश की रक्षा के लिए तत्पर रहें ! इसी अखाड़ा में अखाड़ा विद्या अध्ययन करने वालों के द्वारा सामूहिक रूप से कलात्मक प्रदर्शन ही पंथी नृत्य के रूप में विकसित हुआ ऐसा माना जाता है !
पंथी नृत्य की उत्पत्ति के सम्बंध में यह विचारधारा अत्यंत विशिष्ट है ! इस विचारधारा के अनुसार गुरू घासीदास जी के समय व पूर्व में छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र के मराठा भोसला शासकों का राज्य कायम हो गया था ! वे लोगों का दमन करते, नारी की अस्मिता पर हांथ डालते , लोगों को घर से बेघर व जमीन पर कब्जा करते रहे , पशु धन पर भी आक्रमण करते व पशु से प्राप्त दूध,दही,घी इत्यादि का सेवन स्वयं तो करते और वे इस सम्पदा को अपने देवि, देवाताओं को खिलाते , मुर्तियों का दूध, दही, घीं से अभिषेक करते इस तरह  छत्तीसगढ़ में आतंक सा छाया हुआ था  ! जिसके विरूध्द गुरू घासीदास जी अपने दोनो पुत्र गुरू अमरदास व गुरू बालकदास जी के साथ खड़े थे ! उधर आदिवासी राजा रामराय अपने पुत्र वीर नारायण सिंह  के साथ अड़े थे ! गुरू घासीदास जी व राजा रामराय दोनो में प्रगाढ़ मित्रता थी ! 
अनन्य अन्याय व अत्याचारों के विरूध्द जनमानस संगठित होते गये व प्रतिकार भी करते रहे , यह प्रतिफल गुरू घासीदास जी के प्रतापों का फल था ! 
इसी बीच लोगों ने दूध,दही,घी इत्यादि सम्पदा का धार्मिक आडम्बरों के रूप में किए जा रहे हाश्र को देख कर सांकेतिक मंचीय विरोध करना प्रारंभ किए जिसमें दूध,दही,घीं इत्यादि उपभोग योग्य पदार्थों को गिले घास युक्त व नमी जमीन पर डालकर किचड़ से सज्जित पंक्ति बध्द होकर कुदते उनका ऐसा करने का अर्थ यह था कि जो मुरत बोलता नही है उसे आप दूध,दही,घीं खिला रहे हो और अभिषेक भी कर रहे हो इतना खाद्य पदार्थ व्यर्थ जा रहा है ! उससे अच्छा यह धरती सर्व जननी है हम उसे भोग लगायेंगे हमारे लिए उस मुर्ति से बड़कर यह मातृभूमि है ! इस प्रकार दूध, दही, घीं इत्यादि को धरती पर डालकर उसमें कुदते और मंचीय रुप से धार्मिक, राजनीतिक ,आर्थिक, नारी अस्मिता,भूँ-राजस्व व अन्य शोषण अन्याय का विरोध करते तथा इस नृत्य के प्रस्तुतिकरण के तरिकों में बहुँत ही तेज गति से विकास हुआ  जो कि परिशिष्ट होकर पंथी नृत्य के रूप में स्थापित हुआ ! इस तरह यह नृत्य जनमानस के साथ हो रहे अन्यायों के विरूध्द गायन व नृत्य दोनो विधा को लेकर जन्म हुआ !

पंथी के प्रकार :-

पंथी एक ऐसी मंचीय कला है जो सिर्फ नृत्य न होकर गायन विधा का भी संगम है ! पंथी के सैध्दांत्तिक रूप में या प्रायोगिक रूप में अवलोकन किया जाये तो निष्कर्षत: इसके दो ही प्रकार का होना पाया जाता है !
1. खड़े साज (खड़ी पार्टी)
(1)युवक पार्टी
(2) युवती पार्टी
2. बैठ साज (बइठ पार्टी)
(1)युवक पार्टी
(2)युवती पार्टी

1.खड़े साज (खड़ी पार्टी) : 

पंथी के इस विधा में नर्तक तीव्रगति ये नृत्य करते हैं इसके वादक मांदर,झाँझ,झुमका बजाने वाले खड़े-खड़े नर्तक दल में ही नृत्य करते हुए वाद्य यंत्रों का वादन करते हैं ! खड़े साज पंथी नृत्य को ही विश्व का सबसे तेज नृत्य माना जाता है,  इसमें गीत को एक व्यक्ति के प्रस्तुत करने के बाद दल के समस्त लोग दौहराते हैं ! तथा पैरों की थीरकन कुछ ही क्षणों में हवा से बातें करती है,समान्यत:इस नृत्यविधा के स्टेप छोटे-छोटे होते हैं जो जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं ! इसमें पिरामिड बड़ा ही रोचक लगता है इत्यादि !

2.बैठ साज (बइठ पार्टी) : 

बैठ साज विधा में वादक केंद्र में बैठकर वाद्य यंत्रों को बजाते हैं मांग, झाँझ, झुमका,केसियो,बेंज्जो,पेटी इत्यादि इस विधा में एक गायक और एक रागी होते ही हैं जबकि खड़ी साज में गायक के गीत को नर्तक दल के प्रत्येक लोग मिलकर राग देते हैं! बैठ साज पंथी नृत्य के नर्तक विराम देकर धीमें गति से नृत्य करते हैं इस विधा को भाँगड़ा नृत्य के समतीव्र माना जा सकता है  !

पंथी वेशभूषा व अन्य जानकारी -

पंथी नृत्य प्रारंभिक दौर में पुरूष प्रधान नृत्य रहा लेकिन समय चक्र व परिवर्तन के आगे पंथी की कई स्वरूपों में विकास व परिवर्तन हुए ! जिसमें नारी की सहभागिता भी होना अत्यंत आवश्यक है और महिला पंथी पार्टी व पुरूष पंथी पार्टी का अवतरण प्रगतिशिलता की धार के साथ होता गया ! 
विश्व की समस्त सभ्यता , संस्कृति, कला , गीत, संगीत, वादन, नृत्य , जीवनशैली, रोजमर्रा के व्यतित होने वाले क्षणों में वेशभूषा , पोषाक, आभूषण अनन्य श्रृंगारों इत्यादि का अपना एक अलग मनोरम दर्शन होता है ! प्रत्येक समाज में कला संस्कृति प्रस्तुतिकरण के लिए एक अपना अनूठा, बेमिशाल, आकर्षण युक्त वेशभूषा चयनित होती है जिस कड़ी में सतनाम धर्म व सतनामी समाज के द्वारा किए जाने वाले इस पंथी नृत्य की वेशभूषा का अनुपम छटा है !

१ पुरूष पंथी पार्टी वेशभूषा :-

पंथी दल का वेशभूषा समान्यत: पारंपरिक रहा है तथा यह निर्धारित भी रहा है ! यह एक लोक नृत्य तो है परंतु इसकी गुंज विश्व धरातल तक भी जा पहूंची है ! इसके नर्तक दल की वेशभूषा कुछ इस प्रकार से होते हैं , नर्तक सफेद धोती, सफेद कुर्ते, गले में कंठी माला व आकर्षक रेडिमेंट चमकिले हार भी धारण करते हैं , मस्तक में चंदन के तिलक शोभायमान होता है जो मन को एकाग्रचित कर शांत, लयबध्द पंथी प्रदर्शन में सहायक होता है ! सफेद धोती के उपर कमर पर अन्य रंग के कमरबंध भी बांधा जाता है जिससे आकर्षण में अभिवृध्दि होती है ! मस्तक में सफेद रंग या अन्य रंग के पट्टी (फिता) भी बांधा जाता है , हांथों में सफेद रूमाल भी रखे रहते हैं ! पंथी नृत्य में पैरों की घुंघरूओं का बड़ा महत्व है घुंघरूओं की खनक ही है जो लोगों के मनोभाव को आकर्षित कर अहलादित होने में सहायक साबित करती है ! कुछ पंथी पार्टीयों में रंगीन व तड़क भड़क कपड़ों का भी प्रयोग करते हैं यह वेशभूषा आधुनिकता का परिचायक होता है भला कौन सी संस्कृति होगी जो आधुनिकता से अछूता रहा होगा ! सह्रदयता से हमें आधुनिकता को स्विकार करनी चाहिए परिवर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन अपने परम्परागत संस्कृति का संरक्षण भी आवश्यक है ! कुछ पंथी पार्टी पैरों में घुंघरू, मस्तक में चंदन तिलक, धोती धारण , गले में कंठी माला इत्यादि धारण करते हैं इनकी विशेषता यह भी है यह कुर्ते धारण नही करते तथा जनेऊ धारण किए रहते हैं वह जनेऊ प्रत्यक्ष दिखता रहता है ! जनेऊ सात्विकता का धोतक है जिसे धारण कर सात्विकता का संदेश जन-जन तक पहूंचाने का कार्य पंथी नर्तक दल सहजता से करते हैं !

२ महिला पंथी पार्टी :-

महिला पंथी पार्टी समाज में अप्रतिम आकर्षण का केन्द्र है , अगर किसी गांव में गुरू पर्व पर महिला पंथी पार्टी आने की खबर सुनाई देती है तो देखने की लालसा में दूर-दराज के लोग खिंचे चले आते हैं ! महिलाओं की वेशभूषा सादगीपूर्ण होती है , वे श्वेत साड़ी(वस्त्र )ही धारण करती हैं !  महिलायें भुजाओं में नांगमोरी, कमर में करधन, गले में कंठी माला व सिक्का माला तथा हांथों में सफेद,हरी चुड़ियां, यैंठी, मस्तक पर चंदन का तिलक लगाती हैं विवाहित स्रियां मांघ स्वेत चंदन से भरी रहती हैं ! पैरों में घुंघरू की प्राथमिकता होती है क्योंकि घुंघरू की खनक ही मादकता की प्रसार करती है ! महिलायें बालों में केसाही व सफेद कागज के बने आकर्षक गजरे का उपयोग करती हैं ! यह नृत्य धीमे धुन में मंगल भजन से प्रारंभ होकर तेज नृत्य व पिरामिड निर्माण की पराकाष्ठा तक जा पहूंचती है ! महिला पंथी नृत्य में पिरामिड निर्माण इस कला में अत्यंत दक्ष होने की पहचान होती है ! प्राय: महिलायें पंथी नृत्य में "फुलकांछ" पितल के लोटे को सिर पर रखकर बैलेंस बनाकर नृत्य प्रस्तुत करती हैं जिसका दर्शन आनंददायी होता है !
नव-युवती पंथी दल - पुरूष नर्तक दल चाहे वह नव-युवक हों या उम्रदराज सभी समान्यत: अपने अपने दल की वेशभूषा की प्राथमिकता को देखते हुए वेश धारण करते हैं और उन्हे धोती पहनना अनिवार्य होता है जबकि महिला पंथी पार्टी में उम्रदराज पंथी नर्तकी साड़ियां पहनती हैं और नव-युवतियां सलवार सुट पहन कर नृत्य करती हैं ! नव-युवतियां जो सलवार सूट धारण करती हैं वे  करधन,यैंठी,नागमोरी,सिक्के का माला, चुड़ियां इत्यादि श्रृंगार नही करती ! वे पुरूषों की भांती गले में कंठी माला, मस्तक में सफेद या अन्य रंग का फिता, कमर में कमरबंध कपड़ा, मस्तक में चंदन का तिलक, हांथों में रूमाल तथा चमकदार आर्टिफिसियल हार इत्यादि धारण करती हैं !  नवयुवतियों की इस वेशभूषा व श्रृंगार जो पुरूषों से मिलता जुलता है वह यह संदेश देता है कि बेटी और बेटा दोनो समान है , दोनो की सहभागिता महत्वपूर्ण है ! युवतियां बड़ी चंचलता से पंथी नृत्य करती हैं , पिरामिड व कर्तबों के प्रदर्शन के लिए आतुर रहती हैं ! 
इस तरह हमें ग्यात हुआ की महिला व पुरूष वर्ग के पंथी नर्तक/नर्तकी का वेशभूषा किस प्रकार से होते हैं ! महिला या पुरूष दोनो ही पंथी दल में एक व्यक्ति नृत्य को नेतृत्व करने वाला निर्धारित होता है ! नृत्य के स्टेप बदलने पर वह सिटी बजाकर या इसारों में सभी नर्तक को निर्देशित करता है ! सभी नृत्य करने वालों की निगाहें नेतृत्वकर्ता पर ही टिकी रहती है और वे सहजता से नृत्य प्रतुतिकरण भी करते हैं ! पंथी दल में नर्तक, वादक व गायक तीनो मिलाकर आदर्श संख्या 21 मानी गई है परंतु आज पंथी की आकर्षण व आधुनिकता की वजह से यह संख्या कम ज्यादा होती रहती है !

पंथी नृत्य के वाद्य यंत्र -

पंथी नृत्य के प्रारंभिक काल में लोग गोल घेरा बनाकर ताली बजाते हुए नृत्य करते और सतनाम के जयघोष करते थे तथा उसके बाद छोटे छोटे डंडे लेकर गरभा नृत्य की भांती करते थे जिसमें वाद्य यंत्र मृदंग,झांझ, मजीरा, झुमका, पेटी, घुंघरू हुआ करता था बाद में केसियो,बेंज्जो, माईक, ढ़ोलक, बासुरी, लॉऊडस्पिकर इत्यादि नवीन वाद्य उपकरणों का विलय जारी है ! जिससे पंथी नृत्य व गायन में नवीनता का संचार हो रहा है !

पंथी नृत्य में नारी -

विश्व में प्रत्येक  क्षेत्र में नारी अपनी साहस, कर्मठता, योग्यता, प्रगतिशिलता व कला की परिचय देती आ रही हैं ! नृत्य जगत की ऐसा कोई भी क्षेत्र न हो जिससे नारी का सम्बंध अछूता रहा हो ! कला के क्षेत्र का बिन नारी के कल्पना भी नही किया जा सकता , इसी कड़ी में पंथी नृत्य में नारी शक्ति का आगमन सर्व प्रथम पंथी सम्राट देवदास बंजारे जी के पंथी दल में हुआ ! लगभग सन् 1970 के पहले या आस-पास जिससे पंथी दल की गरिमा व रोचकता में अपार वृध्दि हुई ! पंथी नृत्य का आकर्षण अत्यंत लोकप्रियता को छूने लगा ! श्री बंजारे जी के पंथी दल में पदार्पण करनें वाली नारी इस प्रकार से थीं कु.चित्रपाल, सोमूदास गुप्ता, लक्ष्मी शर्मा, आशा खरे, उषा खरे, मालती रजक और रजनी रजक इन सभी की सहभागिता ने पंथी नृत्य के क्षेत्र में अनुकर्णिय पथ का निर्धारण किया ! जिससे समाज में महिलाओं के लिए नई चेतना का प्रादूर्भाव हुआ, परंतु कुछ रूढ़ीवादी विचारकों ने इसका आलोचना भी किए ! किंतु कहते हैं न सोना आग में तप कर कुंदन बन जाता है , इसी प्रकार पंथी नृत्य में नारी कला का प्रदर्शन आलोचना रूपी अग्नि में तप कर इस क्षेत्र में नारियों के लिए स्वर्णिम मार्ग तय किया ! महिला पंथी पार्टी में तोरण बाई ,जुगा बाई के नाम बड़े ही श्रध्दा से लिया जाता है ! ये लोग देवदास बंजारे जी के समकालीन रहीं और 1970 के आस-पास ही इनके पंथी गीत भजन आकाशवाणी से प्रसारित होती थी ! गंगा राम शिवारे व मण्डली में भी महिलायें पंथी करती रहीं , चंदैनी गोंदा में खड़े साज पंथी होते रहे हैं जिसमें महिलाएँ भी होती हैं परिणाम स्वरूप यह हुआ की कुछ ही वर्षों बाद महिला पंथी दल का निर्माण होना प्रारंभ हो गया ! आज छत्तीसगढ़ के कई गांवों में महिला पंथी दल पाये जाते हैं ! तथा महिला पंथी दल प्रतियोगिताएँ भी आयोजित होती रहती है , गुरू पर्व जैसे शुभ अवसरों पर !

पंथी और समाज -

पंथी कला नृत्य, गायन व वादन का ऐसा त्रिवेणी संगम है जिससे समाज का कोई भी पक्ष अछूता नही रहा है ! यह अपने मनोरम भाव प्रवीणता प्रस्तुतिकरण के कारण जनमानस के मनोभवों में अपना उत्कृष्ट छाप छोड़ा है ! जिससे मानवीय संस्कृति व जीवनशैली के उत्तम सोपानों के व्यापक स्तरों का अवतरण हुए हैं ! पंथी ने लोक चेतना का विकास किया जिसमें नारी सम्मान, बलिप्रथा, धर्म आंध्दता, आडम्बर, नशापान, विश्वबंधुत्व, समानता, रंगभेद, लिंगभेद, बालविवाह, छुआछूत, जातिप्रथा, देशप्रेम, पशु सम्मान व संरक्षण, अहिंसा, चोरी, व्यभीचार, पर्यावरण सुरक्षा, वैग्यानिकता का पोषण, अत्याचार का प्रतिकार, बुजुर्गों का सम्मान, स्वालम्बन, पुत्री संरक्षण, शिक्षा का विकास, कृषिकरण , आत्म सम्मान, भाषा, संस्कृति , कला , योग, साहित्य ,स्वक्षता अभियान इत्यादि क्षेत्रों में जागृति लाने का अमिट किर्तिमान स्थापित किया है ! इस विराट पंथी दर्शन का दर्शन भारत के छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर की जा सकती है !
असकरन दास जोगी
ग्राम : डोंड़












की ( बिल्हा ) 
8120477077

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