अँचरा के राखी
💠 अँचरा के राखी 💠
आज बिहनहे-बिहनहे ल गांव म बड़ चहल-पहल माते हे ! कतको टुरीपिला मन आवत हें जात हें , मुह म लाली, नाक म नथली, कान म दौना, पांव म लछ्छा, गोरंगी, कनिहा म करधन , गर म बने-बने सुघर माला, बने सुघर-सुघर नवा नवा लुगरा पोलखा पहिरे हें पाटी अईसन परे हावयं के झन पुछ , हांथ म थारी दिया अऊ बनेच कन समान धरे-धरे आवत हें जात हें ! येती साहेब दास ह अपन घर के परछी म खांसत-खोखत बईठे सब ल अंताजत हे , का करही बपुरा ह सियान होगे हे ! ओखर खंसई ल सुनके ओकर बहूं कलकलहीन कलाबती ह कईथे येमेर बईठे-बईठे का खासत-खोखरत हस डोकरा जा न तेकर ले खेत डाहर ले घुम-घाम के आ जा ! साहेब दास अपन बहू लंग कईथे ले बने काहत हस जात हवं ! फेर बहू आज का दिन आय नोनीपिला मन बड़ आवत हें जात हें चहल-पहल माते हे गांव म ? कलाबती कईथे तें का करबे जानके जा तोला जे डाहर जाना हे तेती जबरन के आयं के बायं झपावत हे येती ओती के गोठ पुछ के ! साहेब दास कईथे ले भई जात हवं तैं काहे तमियाथस बहू ? ..अईसन कईके साहेब दास अपन सटका ल धर के टेंकत-टेंकत गली कोती निकल जाथे ! साहेब दास मन म गुनथे मोर बहूं ह सोज-बाय गोठियाबेच नई करय जब गोठियाही टेड़गेच के टेड़गा, बने गोठ ह घलो येला करू लागथे ! चल जावं नंदिया खड़ म खेत डाहर खेत-खार ल देख लेहवं , घुम फिर के आ जाहवं ! रसता म जात-जात गांव के मेड़ो म पहूंच गे रथे तईसने साहेब दास ल सतखोजी ह कईथे कहां जावत हस बबा टेंकत-टेंकत , साहेब दास कइथे का करबो ग सियान-सामरथ मनखे टेंकत-टेंकत जात हन ग तुंहर जईसन अब हमर उमर कहां ? थोकन रेंगथन अब धिरताय ल पर जाथे ! सतखोजी कईथे ले बने हे फेर जात कहां हावस ? साहेब दास कथे नंदिया खड़ म खेत डाहर जावत हवं बेटा ! सतखोजी कईथे अच्छा ले ठीक हे जाव ! तईसने साहेब दास कईथे राह थोकन सुन तो सतखोजी बेटा , सतखोजी कईथे का ये बता , साहेब दास कइथे आज गांव म का पाय के चहल-पहल हे नोनीपिला मन के बड़ आवई-जवई लगे हे ? सतखोजी हंसथे ( हहहह) तैं नई जानत हस बबा ? साहेब दास ल अपन हांथ ल देखावत कईथे आज राखी तिहार हावय बबा आज राखी हे ! राखी के नाव सुनते साठ साहेब दास के आँखी डबडबा गय , सतखोजी ल कथे ले जा बेटा तैं अपन घर कईके साहेब दास नंदिया खड़ डाहर अघु निकल गय ! नंदिया खड़ म औरा,धौरा अऊ तेंदू रूख मेर जाके बईठ जाथे , साहेब दास बोम-फार के रो डारथे ! नंदिया कोती ल देखथे सावन के पानी जलाथल भरे हे नंदिया म, ! नंदिया म डोंगहार ह गीत गावत हे :-
बोल :-ये तिहा...र राखी के...२
मैं पुतरी अवं...बहिनी तोर आँखी के.....२
पद:- कोसाही सुतरी.. बांधे तैं मोर नारी म !
अजम लग जाथे मोर दुख तोला... मया के धारी म !
चढ़ :- इही दिन ल जोहत रईथवं...२
आज दिन हे राखी के...
ये तिहा....र राखी के...२
मैं पुतरी अवं...बहिनी तोर आँखी के...२......(1)
अतका गीत ल सुनत-सुनत साहेब दास बिते उमर के दिन के सुध म बुड़ जाथे ! सुध म :- साहेब दास नंदिया खंड़ म अपन खेत ल देखत राहय अईसने सावन के महिना , पानी झिमिर-झिमिर गिरत राहय ! नंदिया म पानी पाठे-पाठ चलत हे , साहेब दास अपन खेत के मुही ल फोरत राहय काबर के पानी जादा होगे रहिस ! ओती बर बिठ्ठल कका ह नंदिया के ओ पार ले डोंगा म बईठार के पांच झन ल ये पार लावत राहय ! डोंगा म तीन झन टुरा पिला दू झन माई लोगिन अऊ बिठ्ठल कका डोंगा ल खोवत-खोवत लानत हे ! जईसे डोंगा बिच म पहूंचीच डोंगा पलटी खागे सब अकबकागें एक झन टुरापिला ह एक झन माईलोगिन ल पानी ल निकालत हे , एक झन टुरा पिला ल बिठ्ठल कका ह निकालत हे ओती एक झन टुरा पिला अपन जीव बंचाय के डर म अकेल्ला तऊंड़ के निकले बर भागत हे ! अईसे-तईसे सब निकलत निकलत बने दुरिहा आगें , ओती बर एक झन नोनीपिला ह गोहार पारत हे बचाव-बचाव मैं बुड़ के मर जाहूं ...ओला उबूक-चूबूक होवत हे ! ओकर आरो ल साहेब दास सुन डारथे , मुही फोरत कुदरी ल फेंक के दऊंड़त जाके नंदिया म कुदथे ! तऊंड़त-तऊंड़त जाके ओ नोनीपिला ल बचाथे बिच धार ल निकाल के जईसे तईसे लाथे ! बांकी झन मन बाहिर आगे राहैं , साहेब दास के निकालत ले ओ नोनीपिला मुरछा खागे राहय ! नंदिया पार म निकाल के ओकर पेट ल चपकथैं पानी पी डरे रईथे तेला बाहिर निकालथैं ले दे के ओ नोनीपिला के होस आईस , सबके जीव म जीव आईस ! होंस आईस त ओ नोनीपिला ह जिव बंचाय बर साहेब दास ल धनबाद दिस ! बांकी झन मन अपन डहर चल दिन ओ मेरा एक झन ओही नोनीपिला, बिठ्ठल कका अऊ साहेब दास बईठिन ओ नोनीपिला धिरतावत रहिस ! साहेब दास कईथे तोर का नाव हे नोनी..अऊ कहां ले आवत हस कहां जाय बर ? त ओ हर कईथे आज राखी तिहार आय भईया , अपन मईके जाय बर आवत रहेवं अपन भाई मन ल राखी पहिराय बर अऊ मोर नाव सुखबाई हे ! साहेब दास कईथे नंदिया पुरा आय हे उपर ले पानी घलो गिरत हे अतका का लकराही परे रहीस आराम से आय रईते ! सुखबाई कईथे राखी तिहार आय भईया हम बहिनी मन ल कतका अगोरा रईथे ये तिहार के हमी मन जानबो , जब तक मया के बंधना भाई के हांथ म बांध नई पावन तब तक अंत्तस ल कल नई परय ! अतका म सुखबाई साहेब दास के हांथ ल देख परथे अऊ पुछते भईया तोर हांथ म तो राखी नईहे तोर बहिनी नईहे का ? साहेब दास हंसथे ( हहह ) कईथे मोर बहिनी पुछथस नोनी ? मोर बहिनी ये नंदिया, रूख, नार, खेत, चिंरई-चिर्गुन अऊ जम्मे छत्तीसगढ़ीन मन हर आयं ! त अतका म बिठ्ठल कका बिच म कईथे सुखबाई नोनी साहेब दास के कोनो बहिनी नईहे, नानकन म होवत साठ एकर महतारी बित गे अऊ साहेब दास ल एकर बाबु हर पोसिच पालिस , ये हर सबला अपन बहिनी मानथे ! अतका म सुखबाई कईथे भईया आज तैं मोर जीव बचाय हस अऊ भईया मन अपन बहिनी के अईसने बिपत के बेरा म रक्छा करथैं आज ले मैं तोर बहिनी आव तैं मोर बड़े भईया ! कोनो तोला राखी नई बांधे हें मैं बांधहूं ..अतका म साहेब दास के आँखी डबडबा जाथे आँसू ह निकल के ठूंठी म आ जाथे , सुखबाई साहेब दास के आँसू ल पोंछथे अऊ सुखबाई अपन अचरा डाहर ल देखथे ! साहेब दास कईथे का देखत हस बहिनी ? त सुखबाई कईथे अचरा म राखी राखे रहेवं अपन भाई मन बर लागथे नंदिया म बोहागे तोला बांधहूं काहत रहेवं ! साहेब दास कईथे ले राहन दे काहीं नई होवय ! अतका म सुखबाई अचरा म बंधाय राखी ल नई पाईस त दगदग ल फबत कोसाही लुगरा के अचरा ल खर के चिर दिस अऊ कहिस मोर जीव बचाय हस आज ले तैं मोर बड़े भईया आस मैं तोला अपन " अचरा के राखी " पहिराहवं कईके साहेब दास के हांथ ल खिंचत सुखबाई ह " अचरा के राखी " बांध देथे ! साहेब दास खुशी के आँसू रोवत रईथे अऊ कईथे मोर लंग तोला देहे बर काहीं नईहे बहिनी , त सुखबाई कईथे मोर जीव बचाय हस भईया अऊ का चाही मोला कुछू झन दे बस आसिरबाद दे ! साहेब दास ओला आसिरबाद देथे ! आसिरबाद देवत-देवत साहेब दास सुध ल बाहिर आ जाथे अऊ अपन बिन राखी के हाथ ल देख-देख रोवत रईथे ! दू बछर होगे हे आज सुखबाई ल " बिते " ! ततके जुहर नंदिया खड़ म साहेब दास के नतनीन सती आ जाथे बबा-बबा कईके हुंत पारत ! साहेब दास के नतनीन सती पहूंचथे त देखथे ओकर बबा रोवत हे , ओहू ह अपन भाई ल राखी पहिराय बर आय हे ! बबा ल रोवत देख के ओ हर जान डारथे येला दीदीककादाई के सुरता आवत हे कईके ! साहेब दास अपन नतनीन सती ल देख के खुश होथे फेर मन म दुख तो हावय बहिनी नईहे तेकर ! सती अपन बबा के दुख देख के बबा के बहिनी वाले किसा ह सुरता आ जाथे ! सती अपन लुगरा के अचरा ल खर के चिर के अपन बबा साहेब दास के हांथ म झट ल राखी बांध देथे अऊ कईथे बबा दीदीककादाई के सुरता करके झन रो आज ले मैं तोला राखी बांधहूं मैं तोर छोटे बहिनी ! सती के अचरा के राखी ल अपन हांथ म पाके साहेब दास बड़ खुश होथे अऊ सती के माथा ल चुम के बड़ आसिरबाद देथे ! सती कईथे चल घर कोती भात खाबे बेरा हर देख बादर म डंगडंग ले टंगा गे हे ! सती के अचरा के राखी पाके साहेब दास खुस होके सती संग घर डाहर आ जाथे !
सिरतोन म हमर जिनगी म बहिनी मन के बड़ महत्तम हे , बिना बहिनी के घर सुन्ना लागथे ! सब राखी पहिरहीं अऊ कोनो एक झन नई पहिरही बिन बहिनी के भाई ह त गुनव ओला कईसे लागत होही ! भाई अऊ बहिनी दोनो बर राखी तिहार बड़ पावन अऊ महत्त रखथे, ते पाय के छत्तीसगढिया मन लंग मोर बिनती हे के "बेटी बचाव राखी तिहार मनाव "
आप अऊ अाप मन के जम्मे परिवार ल मोर डाहर ले 18 अगस्त राखी तिहार के गाड़ा-गाड़ा बधई !
लेखक : असकरन दास जोगी
ग्राम : डोंड़की ( बिल्हा )
मो.नं. 9770591174
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