तुम सन्नाटा हो

तुम सन्नाटा हो

मैं अकेला था
बिल्कुल अकेला
ठुठियों में
चूह रहे आँसुओं को
समेंट रहा था
खोया था
कुछ लम्हों की याद में
दबे पाँव
वह पीछे से आया
झट से
अपने हाथों से
मेरी आँखों को
बंद कर दिया
और बड़ी बेहूदगी से
खिलखिलाते हुए
मुझसे पूछा
ऐसे जैसे
मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगा
आवेश तो आया मुझे
लेकिन उस आवेश को रोक कर
मैने उसे बिना छुए
हँसते हुए
उत्तर दिया
तुम्हें भला
कैसे नहीं पहचान पाऊँगा
तुम्हीं तो मेरे सच्चे मित्र हो
वही हो न
जो अंधेरा लाते हो
घबराहट देते हो
चूहों और छिपकली की आवाज़ को
मेरे कान तक पहुँचाते हो
उस मकड़ी के जाले से
घड़ी-घड़ी
मुझे झाँक कर देखते हो
मुझे तनहा तो
बिल्कुल नहीं छोड़ते
इतना सुनते ही
उसके हाथों की कसावट
शिथिल पड़ी
वह मायूस हुआ
और मैं जोर-जोर से
ठहाके लगाकर बोला
मित्र तुम सन्नाटा हो न |

*#असकरन_दास_जोगी*

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