मुक्ति तो मिले
*#मुक्ति_तो_मिले*
खेतों के बीच बनी
पगडंडियों सी संकरी
हो गई है जिंदगी
और दु:ख
सूरज के धूप की तरह
आँखें दिखा रही है
हम पथिक हैं
चलना थोड़ा मुश्किल है
नामुमकिन नहीं
बस कोने में अवसर रूपी मेढ़ है
और मेढ़ में वह वृक्ष बनकर खड़ी है
उसके पत्ते मानों घने केश हैं
और मैं चाहता हूँ
यहाँ ठहरकर
छाँव रूपी सुख प्राप्त करूँ
किन्तु देखते ही देखते
सब ओझल हुआ
अचानक!
समस्याओं का पहाड़
खड़ा हो गया
अब उस पहाड़ को
चीरने वाली
तेज-तर्रार
पूरे वेग से
बहने वाली
वह नदी है
और प्रेम
उसकी पवित्र धारा
इस धारा में मैं अपना
सब कुछ विसर्जन कर
अनंत शांति को
प्राप्त करना चाहता हूँ
जीवन न मिले
लेकिन...
समस्या और दु:ख से
मुक्ति तो मिले |
*#असकरन_दास_जोगी*
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